Friday, September 20, 2013

कविता

 कविता 

- रमेश मेहता 

उठो 
कि ज्वालामुखी फटने को है 
सहमी हुई हवा 
बदलने को है तूफ़ान में  
सागर में ज्वार आने को है 
नदियाँ तैयार हैं
तोड़ने को 
तटबंध.

उठो 
कि समय के पास नहीं है 
समय
कि करे प्रतीक्षा
रास्तों के पास नहीं है समय 
रुके रहें अनंत काल तक
तुम्हारे मंजिल तक पहुँचने की आस में 
बदली में नहीं है साहस छाई रहे 
निरंतर 
और बरसने का नाम न ले.  

उठो 
कि हो रहा है सागर मंथन 
लिखा  जाने को है एक नया इतिहास 
अंगडाई ले रहा है परिवर्तन 
ऐसे में जो सोये रहेंगे 
पीछे छूट  जायेंगे 
गाड़ी  छूट  जाने के बाद 
कुछ भी नहीं कर पाएंगे.  

उठो 
यह तूफ़ान से पहले की 
ख़ामोशी है