Wednesday, June 8, 2011

नदी

रमेश मेहता

सहज नहीं रह गया है
अब
नदी होना और निर्द्वंद्व बहना

नदी होना
माने
लगातार एक जोखिम को जीना


नदी होना
माने
मैले को ढोने वाली
एक नाली में बदलना


नदी होना
माने
अपनी पहचान
लौटा लाने के लिए
बाबुओं की फाइलों में
छटपटाना


नदी होना
माने
देश को दिन रात
चिन्‍ता में घुलने
और मोटे होते जाने का कारण देना



नदी होना
माने
बरसात की एक एक बूंद को तरसते हुए
सागर तक पहुंचने की चाह में
सूखते चले जाना


नदी के लिए
कठिन हो चला है
धार्मिक अनुष्‍ठानों का बनना
गवाह
गवाही देते हुए अपने अस्तित्‍व को
बचा कर निकल जाना

वर्तमान डरा हुआ है
भविष्‍य की आहट से ।