आज
अचानक बैठे बैठे "गुलकंद" की याद आ गयी. और याद आया कि पहली बार इस का नाम
पनवाड़ी से सुना था. तब दो तरह के पान चलन में थे, "इलायची सुपारी" और
'मीठा.पान जिसमें गुलकंद डाला जाता था ". तम्बाकू वाला पान कोई कोई ही खाता
था. और पान का पत्ता भी दो तरह का... कलकत्तिया और बनारसी. पान पराग ने सब
गुड गोबर कर दिया.
आठवें-नौंवे दशक तक पान के शौकीन पान खाने के लिए पान की दूकान का मुंह जोहते थे. यह बतकही का अड्डा भी था और मौज-मस्ती का भी. उन दिनों पान की दूकान पर दो पोस्टर लगे रहते थे, १. "पान लबों की शान" और २. "उधर मुहब्बत की कैंची है" या :आज नकद कल उधार ". गर्मियों के दिनों में यहीं लोगों की प्यास बुझाने के लिए मुफ्त में पानी पिलाया जाता था और वह भी शीशे के गिलास में.
जम्मू की हरी और उत्तम टाल्कीस के बाहर जो पान की दुकानें थीं वह रात को २ बजे तक खुली रहती थीं.
आठवें-नौंवे दशक तक पान के शौकीन पान खाने के लिए पान की दूकान का मुंह जोहते थे. यह बतकही का अड्डा भी था और मौज-मस्ती का भी. उन दिनों पान की दूकान पर दो पोस्टर लगे रहते थे, १. "पान लबों की शान" और २. "उधर मुहब्बत की कैंची है" या :आज नकद कल उधार ". गर्मियों के दिनों में यहीं लोगों की प्यास बुझाने के लिए मुफ्त में पानी पिलाया जाता था और वह भी शीशे के गिलास में.
जम्मू की हरी और उत्तम टाल्कीस के बाहर जो पान की दुकानें थीं वह रात को २ बजे तक खुली रहती थीं.
