नदी
रमेश मेहता
सहज नहीं रह गया है
अब
नदी होना और निर्द्वंद्व बहना
नदी होना
माने
लगातार एक जोखिम को जीना
नदी होना
माने
मैले को ढोने वाली
एक नाली में बदलना
नदी होना
माने
अपनी पहचान
लौटा लाने के लिए
बाबुओं की फाइलों में
छटपटाना
नदी होना
माने
देश को दिन रात
चिन्ता में घुलने
और मोटे होते जाने का कारण देना
नदी होना
माने
बरसात की एक एक बूंद को तरसते हुए
सागर तक पहुंचने की चाह में
सूखते चले जाना
नदी के लिए
कठिन हो चला है
धार्मिक अनुष्ठानों का बनना
गवाह
गवाही देते हुए अपने अस्तित्व को
बचा कर निकल जाना
वर्तमान डरा हुआ है
भविष्य की आहट से ।
Wednesday, June 8, 2011
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