‘अज्ञेय’ के शहर
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रमेश मेहता
‘अज्ञेय’ के शहरों की बात करते हुए सहज ही इस बात की ओर ध्यान चला जाता है कि क्या
हम वास्तव में किसी एक शहर को ‘अज्ञेय’ का शहर कह सकते हैं? शायद नहीं। एक टैंट के भीतर जन्म लेने वाले इस यायावर ने न जाने कितने शहरों
को आबाद किया और फिर निर्मोही की तरह छोड़ दिया और शायद कभी पीछे मुड़ कर नहीं
देखा। यह अलग बात है कि वह जहां भी रहे अपनी एक छाप छोड़ते चले गए और छोड़े हुए
शहरों को अपने साहित्य में फिर-फिर याद करते रहे।
‘अज्ञेय’ के द्वारा जिए गए शहरों में मेरे एक नहीं दो दो शहर हैं. जम्मू-कश्मीर सम्भवत:
तब भी और अब भी भारत देश का अकेला राज्य है जहां राजधानी हर छ: माह में बदल जाती
है। कभी जम्मू तो कभी श्रीनगर। संयोग से ‘अज्ञेय’ का बचपन दोनों ही शहरों में बीता था.
महाराजा प्रताप सिंह ने 1905 में
अंग्रेजों द्वारा छीनी गई सभी प्रशासनिक शक्तियां पुन: प्राप्त कर लेने के बाद
दूरगामी सुधारों का सिलसिला शुरू किया था और इसी क्रम में भारत सरकार से ‘अज्ञेय’ के पिता पंडित हीरानंद शास्त्री की सेवाएं जम्मू-कश्मीर में पुरातत्व
विभाग की स्थापना के लिए हासिल की थीं। फलत: 1919 से 1921 तक पंडित हीरानंद शास्त्री
को जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए काम करना पड़ा था। उनके पद के महत्व को इसी बात
से भली-भांति आंका जा सकता है कि उस ज़माने में उनका वेतनमान 200-400 रुपये था।
काम के सिलसिले में उन्हें भी अन्य दरबारियों के ही समान हर छ: महीने में अपना
बोरी-बिस्तर बांध कर श्रीनगर से जम्मू और फिर श्रीनगर जाना होता था और यही क्रम
उनके साथ-साथ उनके परिवार को भी अपनाना
होता था।
7 मार्च 1911 को जन्मे ‘अज्ञेय’ का जम्मू और श्रीनगर में जो बचपन बीता है उसकी उम्र कुछ ऐसी न थी जिसमें
सामान्य बच्चे कुछ बहुत ज्यादा याद रख पाते हैं मगर यही तो अज्ञेय की विलक्षण
प्रतिभा का कमाल है कि वह प्रारम्भ से ही खुली आंखों दुनिया को देखने की महारत
रखते थे। इसका प्रमाण उनके द्वारा ‘शीराज़ा’ के यात्रा विषेशांक के लिए विषेश रूप से लिखे गए यात्रा संस्मरण ‘एक पैदल यात्रा’ शीर्षक यात्रा-संस्मरण में भी मिलता है जिस में जम्मू से श्रीनगर तक की कभी
टांगे पर और कभी पैदल तय की गई यात्रा का सिलसिलेवार वर्णन मिलता है ।
अब आप स्वयं ही अनुमान लगा लीजीए कि आठ साल के ‘अज्ञेय’ को जम्मू या श्रीनगर के बारे में कितना ज्ञान रहा होगा। मगर नहीं। 1983 में
जब मैं उन्हें जम्मू के रघुनाथ मन्दिर लेकर गया था तो यह देखकर चकित रह गया था
कि मंदिर से बाहर निकलते ही वे बिना कुछ बोले सिटी चौक की दिशा में आगे बढ़ चले
थे। चलते चलते वे ‘हरि टाकीज’ के सामने के फुटपाथ पर खड़े होकर एक घर को देखने लगे थे। थोड़ी देर एकटक उस
चौबारे को देखने के बाद बोले थे – ‘बचपन में हम इसी घर में रहते थे। यह
सोडावाटर फैक्ट्री तब भी यहीं थी।‘
फिर बोले यहीं से एक रास्ता फत्तू-चौगान
को जाता है न ? मेरे हां बोलने पर कहने लगे तो चलो वहीं चलते हैं । वहां पहुचने पर चौराहे पर
जस के तस खड़े बरगद के पेड़ के नीचे खड़े
होकर बताने लगे थे – ‘’वहां, उस गली में धनवन्तरी रहा करते
थे जहां हम ने अंग्रेजों की पुलिस से बचने के लिए शरण ले रखी थी और यह वह गली है
जहां से ‘ढक्की’ उतर कर हम लोग तवी नदी में नहाने जाया करते थे।‘’ कुछ देर तक वह वहां खड़े पुरानी यादों में खोये रहे होंगे फिर बोले ‘चलें’ ? और हम लौट आए थे ।
यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि
धनवन्तरी स्वयं एक क्रांतिकारी थे और काला पानी की सज़ा काट चुके थे। जम्मू-कश्मीर
क्योंकि सीधे तौर पर अंग्रेजों के आधीन नहीं था इसलिए छुपने के लिए जम्मू में
उनका निवास उपयुक्त स्थान हो सकता था। वैसे भी धनवन्तरी के साथ उनकी निकटता का
अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ‘’ ‘अज्ञेय’ अपने बारे में’’ रघुबीर सहाय के एक प्रश्न के उत्तर में ‘अज्ञेय’ ने स्वयं यह माना है कि चन्द्रशेखर आज़ाद
से उनका परिचय धनवन्तरी ने ही कराया था...
‘अज्ञेय’ के शहरों के संन्दर्भ में जम्मू और श्रीनगर पर बात करने
के लिए ‘अज्ञेय’ के अपने साहित्य से बढ़ कर प्रामाणिक संदर्भ भला और कहां
मिलेंगे ?
‘अज्ञेय’ की एक बड़ी प्रसिद्ध कविता है – असाध्य वीणा. कविता के अंत मे जब केशकंबली वीणा बजा लेने के बाद उसे वापस धरती पर रख देते
हैं तो उस वीणा वादन के सभा पर पड़ने वाले प्रभाव को व्यक्त करते हुए ‘अज्ञेय’ लिखते हैं -
“डूब गए सब एक साथ
सब अलग अलग एकाकी पार तिरे
सब ने भी अलग अलग संगीत सुना”
उस सुने गए संगीत में किसी को एक चीज़
सुनाई या दिखाई दे रही थी तो किसी को दूसरी। अंतत:
“सब डूबे
तिरे झिपे
जागे
हो रहे वशंवद
स्तब्ध
इयत्ता सबकी
अलग अलग जागी’’।
कुछ कुछ ठीक वैसी ही स्थिति उन सब
लोगों की होती है जो किसी शहर को जानने का दंभ भरते हैं। कुछ लोग होते हैं जो
सालों साल किसी शहर में बिता देने के बाद भी उस शहर को बस उतना ही जानते हैं जितना
के उनके लिए अपनी दिनचर्या के निवर्हन के लिए जानना जरूरी होता है। दिल्ली के
लालकिला में घूमते हुए मेरे एक ममेरे भाई ने मुझे बताया था कि दिल्ली में तीस साल
रहने के बावजूद उसने इससे पहले कभी लाल किले में पांव नहीं रखा था। इस विसंगति का
वह अकेला शिकार नहीं था... कमोवेश हम सब लोगों की यही दशा है। दूसरी ओर सैलानियों
की बात करें तो वे उतना ही देखते हैं जितना कि उन्हें दिखाया जाता है । ऐसे में ‘अज्ञेय’ के शहरों की बात करें तो अचम्भा होता है कि कैसे वे एक साथ शहर के वासी और
सैलानी, दोनों, दृष्टियों से शहर को देख पाते हैं । यूं जैसा कि मैंने पहले भी कहा
है यह कहना भी कठिन ही है कि ‘अज्ञेय' का शहर हम किसे मानें ? कारण? वह कभी एक जगह टिक कर रहे ही नहीं। वह तो यायावर थे। मगर जहां जितनी देर रहे वहीं
के होकर रहे।
‘अज्ञेय’ के शहर उनकी रचनाओं में भी अपनी भरपूर उपस्थिति दर्ज करते दिखाई देते हैं।
इन्हें लेकर अज्ञेय ने कुछ ऐसी बातें भी कहीं हैं जिनकी ओर सामान्यत: बहुत कम
लोगों का ध्यान जाता है।
‘अज्ञेय’ ने श्रीनगर को या
तो तब देखा था जब उन्हें पिता की नौकरी के कारण वहां अपना बचपन बिताना पड़ा था या
जब वे वैज्ञानिक खोजों के संदर्भ में कश्मीर आए थे. उनके बचपन का कश्मीर आज के
कश्मीर से बेहद भिन्न था. तब जम्मू से श्रीनगर जाना कितना कष्टप्रद था इसकी
कुछ-कुछ बानगी हमें शीराज़ा हिन्दी के पूर्णांक 88में प्रकाशित ‘एक पैदल यात्रा’ शीर्षक
यात्रा-संस्मरण में मिलती है जहां ‘अज्ञेय’ लिखते हैं,
“मैं उन दिनों की
बात करता हूं जब जम्मू-श्रीनगर की सड़क ही नहीं बनी थी, बनिहाल की लम्बी सुरंग
भी नहीं; जब खासकर ग्रामों में यह रास्ता चलता तो था लेकिन आना जाना पैदल होता था,
सामान की ढुलाई खच्चरों पर होती थी या कुली करते थे और जब बनिहाल-पास पैदल बर्फ
पर चलते हुए पार किया जाता था.
और जब जम्मू से श्रानगर की यात्रा 10 दिन से लेकर 13 दिन
तक में पूरी की जाती थी”
आम आदमी के मन में कश्मीर के सौंदर्य
को लेकर अजीब तरह की मगर मोहक तस्वीर बनी हुई है किन्तु ‘अज्ञेय’ की दृष्टि उस सौंदर्य के पीछे छिपी
हकीकत को जानने को बेचैन दिखाई देती है। तभी तो वह नदी के द्वीप में विश्व प्रसिद्ध् डल झील की नौकुछिया से तुलना कुछ इस तरह करते हैं -
‘’श्रीनगर की झील और नौकुछिया का अंतर स्वयं मन पर चोट करता
था। निस्संदेह श्रीनगर में सब कुछ बड़े पैमाने पर था, बड़ी चौड़ी उपत्यका, बड़े
पर्वत-श्रृंग, बड़ी झील – बड़े लोग! - पर नौकुछिया एक
सुन्दर हरे निर्जन में जड़ा हुआ छोटा सा नगीना था, और यह – जनाकीर्ण मग में
आभूषणों से लदी पुंश्चली स्त्री. . . क्या हुआ अत्यंत सुन्दरी है तो ? ‘पब्लिक फे़सेज इन पब्लिक प्लेसेज!’ ’’
नौकुछिया के प्रति ‘अज्ञेय’ के आकर्षण का एक
बड़ा कारण उनका एकांतप्रिय होना भी हो सकता है। वैसे भी पिता के साथ अधिक समीपता
होने और उनके साथ निरंतर पुरातात्विक अवशेषों में घूमते हुए सौंदर्य के उनके
प्रतिमान अलग ही हो सकते थे। ऐसे में सैलानियों का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर
और उसमें भी श्रीनगर उन्हें कैसे लुभा सकता था ?
कश्मीर क्योंकि सालों साल विदेशी आक्रांताओं के निशाने पर
रहा और पर्यटकों का प्रिय स्थल भी इसलिए कश्मीरियों में एक खास तरह की वाक्पटुता
देखी जा सकती है मगर नदी के द्वीप में ही अज्ञेय कश्मीरियों की इस विशेषतः
को समाजशास्त्रीय द्रष्टि से देखते हुए इस प्रकार रेखांकित करते हैं - ‘सलामा ने सेवा-पटु कश्मीरी लहज़े में पूछा – ‘’चाय लाऊं मेम साहब
?’’ अर्थात सेवा-पटुता उनका विशेष गुण बन
गया है। सेवा-पटु के साथ कश्मीरी का प्रयोग निश्चय ही ‘अज्ञेय’ ने विशेष प्रयोजन से किया है. इससे कहीं
यह भी ध्वनित होता है कि कश्मीरियों के हिस्से मात्र सेवा करना ही आया था।
कश्मीर की सतह पर फैले सौंदर्य के नीचे छिपी गंदगी की ओर
संकेत करते हुए ‘अज्ञेय’ लिखते हैं, ‘’उदास, मलिन, गंदा, बदबूदार श्रीनगर, गंदली मैला ढोने वाली
नदी, उदास फैला आकाश, जैसे म्रियमाण आबादी पर पहले से छाया हुआ कफन – भुवन ने ऊपर
बायें को देखा, शंकराचार्य की पहाड़ी भी उतनी ही उदास, केवल उस धुंधले, तोते के
पिंजरे जैसे मंदिर के ऊपर की बत्तियां टिमटिमा रही थीं भोर के तारे की तरह
धैर्यपूर्वक...
अरे यायावर रहेगा याद’’
शहरों को देखने और याद रखने के ‘अज्ञेय’ के अपने तरीके हैं । जैसा कि ‘सन्नाटे का छंद’ वृत्तचित्र में
अपने बचपन की चर्चा करते हुए वे ध्वनिओं और गतियों को याद रखने की बात करते हैं।
ठीक वैसे ही श्रीनगर शहर की विश्ोषता की चर्चा करते हुए वह वहां की गंधों को याद
करते हुए लिखते हैं, ‘’भारत के नगरों की अपनी अपनी विशेषताएं हैं । यों तो किसी भी
शहर को एक विशेषण से नहीं बांध लिया जा सकता क्योंकि प्रत्येक में विविधता है,
किन्तु उस विविधता की भी अलग लीकें हैं ।यथा जोधपुर में रंगों की विविधता उसे
विशिष्ट करती है, श्रीनगर में गंधों की विविधता (‘सहस्रगंधा नगरी’) …..’’ (अरे यायावर रहेगा याद)
बचपन के श्रीनगर और जवानी में देखे श्रीनगर के भेद को भी ‘अज्ञेय’ ने बखूबी ब्यान
किया है, ‘’श्रीनगर और आस-पास का प्रदेश बचपन का परिचित था; श्रीनगर के लिए विशेष उत्साह
बचपन में भी नहीं रहा था और अब जब आ कर देखा कि तब की बड़ी-बड़ी चीजें छोटी-छोटी
लगने लगी हैं, पहले की नौ सौ निन्नानवे गंधों का स्थान अब तक एक हजा़र गंधों ने
ले लिया है, हतबियों के चेहरे कम उजले और पैरहन कहीं अधिक मैले हो गए हैं, और जो
कमल के फूल पहले यों ही लुट कर एक शिरसा धार्य विभूति रहते थे, अब बिकने लग कर हेच
हो गए हैं – तब बची-खुची स्फूर्ति भी जाती रही। केवल एक उदास नंगी जगह
जिस की पुकार की प्रेरणा अब भी दुर्निवार है, फिर जा देखी – हरमुख श्रृंग की अधिपत्यका पर बना हुआ परिमहल, जिस ने अपने को चारों
ओर से दीवारों में समेट कर आकाश के प्रति खोल दिया है, और जिस के आगे श्रीनगर का
सारा सौंदर्य बिछ गया है….कवयित्री बेग़म ज़ेबुन्निसा का यह महल – (परिमहल यों
जल-विहार के लिए बना होगा, वहां जल प्रणालियों के अवशिष्ट अभी हैं, यद्यपि पानी
का निशान भी नहीं रहा, ओर बहते पानी का कल-कल कितना सांत्वनाप्रद होता है, इस की
गवाही अनेकों कवि देते हैं)। कभी कितने चाव के साथ बनवाया गया होगा – आसपास के
सजे-सजीले रूप से उतना ही पृथक् जितना कि अंतर्मुखी ज़ेबुन्निसा अपने परिमंडल से
पृथक थी – वैसा ही पृथक् और वैसा ही रूप-प्रसार को तटस्थ भाव से ग्रहण करने की शक्ति
के कारण सुन्दर। यह सूखा परिमहल, जहां प्यास मिटाने के लिए पानी नीचे से साथ ले
जाना पड़ता है; और सामने फैला हुआ पानी-पानी-पानी !’’
मेरा मानना है कि परिमहल को इस दृष्टि से शायद ही किसी अन्य
पर्यटक या स्थानीय निवासी ने देखा होगा।
रहमत के बहाने से कश्मीरियों के मूलमंत्र की चर्चा करते
हुए अज्ञेय कयमीरियों के चरित्र की एक बहुत बड़ी विशेषता की ओर कुछ इस अंदाज़ में
संकेत करते हैं – ‘रहमत ने खाना बनाने का अनुभव अपने पैंतालीस वर्ष के जीवन
में दो-तीन वर्ष ही किया था, पर शरीर से वह स्वस्थ था, कांति से हंसमुख और तबीयत
का फक्कड़ – कश्मीरी के दर्शन का मूल-मंत्र ‘कुछ फिकिर नेई’ उसने घुट्टी में
पिया था।‘
बस यदि कहीं उन्हें कुछ थोड़ा सा अच्छा लगता है तो वह है
वह घर और मोहल्ला जहां उनका बचपन बीता था. ‘’कुछ आगे दाहिने को
झेलम के एक बड़े परिवृत्त में राममुंशी बाग के बंगले जिनमें से एक में बचपन का
निर्भय अंश बिताया था – वह अंश जिसमें उभरते व्यक्तित्व की विपंची को प्रकृति की
अंगुलियों रहय की शत शत मिज़राबों से झंकारती रहीं ।
शेखर एक जीवनी भाग दो में भी कश्मीर से जुड़ी
परंपरागत धारणाओं पर चोट की गई है
‘’श्रीनगर में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था – सिवाय भिन्न
भिन्न प्रकार की गंध के। नगर के बाहर सुप्रसिद्ध उद्यानों की सैर भी उसने की – वहां पर थी केवल
रेखाएं और कोण और वृत्त – और वृक्षों की कठोर शालीनता और अति व्यवस्था केवल मृत्यु
की शान्ति का ध्यान दिलाती थी। जिस व्यक्ति ने इन उद्यानों पर लिखाया था, ‘’अगर फिरदौस बररुए
ज़मीन अस्त, हमीन अस्तो हमीन अस्तो
हमीन अस्त’’ वह अवश्य कोई गणितज्ञ रहा होगा, जिसे बागबानी का शौक
चर्राया होगा. . . शेखर ने नदी-नाले और झीलें पार कीं, पर उनका सौंदर्य दर्शकों और
यात्रियों की, और उनके धुएंदार डूंगों की बेहूदा भीड़ से विकृत हो गया था। तब उसने
नगर छोड़ कर हिमालय की अक्षत शुभ्रता में छिपी हुई एक झील की ओर प्रयाण किया।‘
’अज्ञेय’ को पहाड़ों का एकांत आकर्षित करता है। ‘शेखरः एक जीवनी
में उपलब्ध है. वे लाख श्रीनगर की गंदगी और गंधों से तंग आ गए हों मगर कश्मीर का
सौंदर्य उन्हें बार बार अपनी और खींचता है. ‘शेखरः एक जीवनी’ में वे लिखते
हैं, ‘’उन कुमुद के फूलों ने उसके विचार की धाराओं को जिस मार्ग पर डाल दिया, और
छुट्टियों में घर न लौटने के निर्णय ने उस पर जो कैद लगा दी, उसके कारण शेखर के मन
में शीघ्र ही कश्मीर जाने की लालसा तीव्र हो उठी। उसके शैशव का वह सुन्दर
क्रीड़ास्थल. . . कितने दिन हो गए थे उसे कुछ भी सुन्दर देखे हुए, और कितनी
तीव्र वेदना थी उसके हृदय में कुछ ऐसा देखने के लिए – जो सुन्दर हो,
संपूर्ण सुन्दर हो . . .’’
अज्ञेय ने अपने साहित्य में जम्मू की अधिक चर्चा नहीं की
है। इसका एक संभवित कारण यह हो सकता है कि
बचपन के दिनों के बाद उनका यहां रहना बहुत कम हुआ होगा। धनवन्तरी के यहां रहते हुए उन्हें अवश्य ही जम्मू के बारे में भी
ढेरों अनुभव हुए होंगे जिनकी चर्चा बहुत संभव है कि ‘शेखर एक जीवनी’ के तीसरे भाग में
हो मगर वह तीसरा भाग हैं कहां ?
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